O Naadan

अरे ओ नादान

क्यों बेचैन हो
दुनिया जहां के सवालों में
क्यों हैरां हो
इन हालातो में

क्या फर्क पड़ता है किसी को
कोई रोया भी था क्या
कभी अंबर के सूनेपन को
नदियों के सिमटते अस्तित्व को
नम आंखों के ठहरे हुए पलों को
इन आंसुओ को देखकर पसीजा था क्या दिल किसी का

सुनो नादान

कैलेंडर भी बदलती तारीखे ही दर्ज करता है।
समय भी आगे बढ़ता रहता है
क्या फर्क पड़ता है
एक और प्रजाति विलुप्त होने पर किसी को इतिहास के पन्नो में……

अरे नादान

तरासो अपने वजूद को
निखरो किसी सूर्य सा
अंबर पर छाने को…..
दुनिया जहां का बटोही न बन
खुद को तराश कर
खुद का बटोही बन
खुद की यात्रा……
इतिहास की सिमटी हुई कहानी का ध्रुव तारा बन
जगमग बन
कोई सितारा बन……

क्रमश:
Kuldeep “upmanyu”
मुक्तक

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