Hindi Story Saiyan Bhaye Kotwal

Hindi story Saiyan Bhaye Kotwal | सैंया भए कोतवाल

Hindi story Saiyan Bhaye Kotwal एक व्यंगात्मक कहानी है‚ जो एक जाने माने व्यंग लेखक सी०भास्कर राव ( C. Bhaskar Rao ) द्वारा लिखित संग्रहों में से एक है। जिसे पढ़कर आपको बहुत ही आनन्द आयेगा। यदि यह व्यंगात्मक कहानी  आपको पसन्द आती है तो इसे अपने Friends, Relatives आदि के साथ साझा करना बिल्कुल भी न भूलें।

उस दिन भैया जी से मुलाकात हो गयी भैया जी, यानी अपने नगर के छुटभैया नेता से हालांकि मैं उससे कतराना चाह रहा था, लेकिन उसने मुझे पकड़ ही लिया। पकड़ बड़ी मजबूत थी, जैसा कि आम तौर पर नेताओं की बोटों पर, कुर्सी पर या घोटालों पर होती है। बचने का कोई उपाय नहीं था वह पकड़ता भी है तो सीधे गर्दन, ताकि आप छुड़ा ही न सकें क्या करूं, बचपन में हम स्कूल में साथ पढ़ते थे, सो अब भी वह मुझे अपना दोस्त समझता है और गाहे-बगाहे मुझे दबोच लेता है।

यों अब हम दोनों के धंधे अलग हो चुके हैं। मैं मास्टरी करता हूं और वह नेतागिरी। पहले वह अपने धंधे में पार्टटाइमर था, पर अब लगभग फुलटाइमर हो गया है। जब भी कहीं मुझे मिल जाता है, पकड़कर, टेल-ठालकर किसी होटल में ले जाता है। बिना मेरी जेब पर रहम किए, होटल का अधिकांश हर मान भकोस लेता है और पैसे चुकाने का नैतिक दायित्व मुझ पर छोड़ देता है। में बलि के बकरे की तरह मिमियाता सा पैसा चुकाता हूँ।

उस दिन भी वही हुआ प्यार से मेरी गर्दन दबोचे-दबोचे वह मुझे एक होटल के अंदर घसीट ले गया और में अपनी जेब में हाथ डाले पैसे टटोलता रहा कि आज इज्ज़त बचेगी भी या नहीं। पर इसकी नौबत नहीं आयी। वह बड़े मूड में था बहुत खुश उसका उत्साह हलका पड़ रहा था।

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“क्या खाओगे?” उसने शाही अंदाज़ में पूछा।

Hindi story Saiyan Bhaye Kotwal में आगे की कहानी कुछ इस प्रकार है–

“बस चाय” मैंने कहा यह सोचकर कि आखिर पैसे तो मुझे ही चुकाने पड़ेंगे।

“सिर्फ चाय क्यों, आज जो मर्जी वही खाओ पैसे में चुकाऊंगा।” बड़ी शान से उसने कहा।

मैं घबरा गया। लगा कि आज इसकी नीयत ठीक नहीं है। मुमकिन है कि मेरे कपड़े ही उतर जाएं। मेरा दुर्भाग्य कि मैंने अंडरवियर भी नहीं पहना था। मास्टरी की नौकरी में पाजामा भर का जुगाड़ हो जाता है, यही बहुत है। अंडरवियर, बनियान की ऐयाशी की गुंजाइश ही कहां है। उसका जोश देखकर मुझे यही महसूस हो रहा था कि आज मेरी खैर नहीं है। सच कहूं तो मारे डर के मुझे लघुशंका की आवश्यकता महसूस हुई।

“बस, मैं एक मिनट में निपटकर आता हूं।” मैंने कहा।

“अरे बैठ भी।” उसने मुझे एक मतपत्र की तरह जकड़ लिया। उसने मेरे दोनों कंधे बैलेट बॉक्स की तरह मज़बूती से धाम रखे थे। मुझे आशंका हुई कि कहीं मेरा पाजामा गीला न हो जाय, फिर भी इस देश के एक

आम डरपोक नागरिक की तरह मैं सहमा सिकुड़ा बैठा रहा।

“आज बात क्या है?” मैंने झिझकते हुए पूछा।

“आज मैं बहुत खुश हूं प्यारे” उसने कहा और मेरे सिर पर एक धौल जमाया। पल भर को मेरी आंखों के सामने अंधकार छा गया। यह उसकी एक लोकतांत्रिक शैली है। “किसलिए खुश हो?” मैंने पूछा उसकी दूसरी धौल से बचते हुए यानी लोकतंत्र से। “पहले खाओ-पीओ मस्ती से, फिर बताऊंगा।” वह बोला।

मैं उसकी माया समझ नहीं पाया। भीतर से मेरी हालत काफी खराब थी। सोचा कि मुझे खिला-पिला कर मेरी नरेटी ही न दबा दे और मेरी हत्या का आरोप अपने विरोधियों के सिर मढ़कर कोई राजनीतिक खेल न शुरू कर दें। उससे दे बचने का तत्काल कोई उपाय नहीं था। उसके चक्कर में फंस चुका था। उसने मिठाई, नमकीन, चाय वगैरह मंगवाई। वह तो मज़े से अपना हिस्सा हलक के नीचे उतार रहा था, पर मुझे पानी पी-पीकर उन्हें पेट में पहुंचाना पड़ रहा था। खा-पीकर उठने की बारी आयी तो मुझे पसीना आने लगा। पैर कांपने लगे। पर यह एक फूहड़ फिल्मी गीत गुनगुना रहा था।

मुझे लगा कि वह डकार लेता हुआ, पहले की तरह इत्मीनान से बाहर निकल जाएगा और मैं गर्दन झुकाकर, गिन-गिन कर पैसे चुकाऊंगा, पर आश्चर्य की बात है कि उसने एक झटके से बड़ी लापरवाही के साथ अपनी जेब से सौ-सौ के नोटों की एक भरी-पूरी गड्डी निकाली। यानी पूरे दस हजार रुपये मैं अपनी आंखें फाड़े गड्डी देखता रहा। उसने बड़ी बेरहमी से उसे तोड़-मरोड़ कर सौ रुपये का एक नोट बाहर निकाला और चुकाने के लिए मुझे पकड़ाया मैं मन-ही-मन हर देवी-देवता को लाख-लाख शुक्रिया अदा करता हुआ अपना पाजामा संभालते हुए, जो अब तक गीला नहीं हुआ था, काउंटर की ओर लपका कि कहीं इस बीच उसकी नीयत न बदल जाय।

बाहर निकलकर मैं उससे छूटने के बहाने ढूंढ़ने लगा।

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“तो मैं चलूं?” मैंने कहा।

Hindi story Saiyan Bhaye Kotwal में आगे की कहानी कुछ इस प्रकार है–

“अबे कहां चलूं। पहले यह तो बता दूं कि आज मैं इतना खुश क्यों हूं।” उसने लगभग मुझे झिड़कते हुए कहा। “तो बता दो।” मैं बोला।

“मामला प्राइवेट है। पहले घर चलो, वहीं बताता हूं।” उसने कहा।

उसके घर जाने के नाम पर मेरी धिघ्धी बंधने लगी। मैं ठहरा शहर का एक निरीह और निहायत शरीफ आदमी और देश के हर शरीफ आदमी की तरह दरिद्र और वह शहर का नामी गुंडा छुटभैया नेता मैं ठहरा एक दुबला-पतला, कमजोर • आदमी और वह भारी-भरकम पहलवान हम दोनों में वही बुनियादी फर्क है जो भारत वर्ष की जनता और नेता में होता है। मैं मास्टरी ही करता रह गया और वह दादागिरी के जरिए नेतागिरी तक पहुंच गया।

उसके घर जाना, यानी शहर में सिरे से बदनाम हो जाना था। मैं किसी तरह उससे पीछा छुड़ाने को बेचैन था, पर वह मुझे नहीं छोड़ने के लिए कटिबद्ध था। मैं उसकी गिरफ्त में पूरी तरह आ चुका था। यदि भागने की कोशिश करता तो उसका एक झापड़, मेरे लिए परलोक पहुंचने का पासपोर्ट बन जाता।

उसने पहले मुझे सिगरेट पिलायी।

फिर पान खिलाया तब एक ऑटो रोककर मुझे बलात् उसमें बैठा लिया और सीधे अपने घर ले आया। सालों बाद में उसके घर आया था। उसकी रईसी देखकर दंग रह गया। वह महज एक बड़ा गुंडा और छोटा नेता था, पर उसका घर किसी सेठ-साहूकार या अफसर की कोठी से कम नहीं लग रहा था।

मुझे लगा कि अब शीघ्र ही उसकी उन्नति एक बड़े नेता के रूप में हो जाएगी। न उसे कोई चुनाव लड़ने या जीतने से रोक पायेगा और न ही विधायक, सांसद या मंत्री बनने से इस देश को एक और महानू गुंडा नेता मिलेगा, जो देश की सेवा के नाम पर देश को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। मुझे देश का और दोस्त का भविष्य बड़ा ही उज्ज्वल प्रतीत हुआ। मैं उसका भविष्य देख रहा था और वह मुझे खींचकर भीतर ले गया।

भीतर यानि अपने बेड रूम में वहां फिल्मी तारिकाओं की नग्न और अर्धनग्न तस्वीरें कमरे की शोभा बढ़ा रही थीं। उनमें भारतीय नारित्व की इक्कीसवीं सदी झांक रही थी। बेडरूम में एक शानदार पलंग था। पलंग पर दो-तीन चमकदार सूटकेस खुले हुए थे और उनमें कीमती कपड़े, गहने और नोटों के बंडल ठुसे बिखरे दिखलाई पड़ रहे थे। मेरी आंखें फैल गयीं। मुंह खुल गया। वह सब मैं पहली बार देख रहा था और मेरी गरीबी उसे देखकर बेहोश हुई जा रही थी। मैं हक्का-बक्का था।

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वह हंस रहा था।

“देखा, यह सारा माल।” उसने बड़े गर्व के साथ कहा।

“यह सब क्या है?” लड़खड़ाती ज़बान में मैंने पूछा। ।

वह बोला “यह सब एक रात की कमाई है”।

‘‘एक रात की !” मैं भौंचक था।

“हां यार, कल रात से एक नया धंधा शुरू किया है। अब समझो चांदी ही चांदी है।” उसकी खुशी छलकी पड़ रही थी। चांदी तो उसकी पहले ही थी। कहना चाहिए था कि अब सोना-ही-सोना है।

“कौन-सा घा?” मैंने पूछा। “बड़ा ही फायदेमंद धंधा है।”

“कौन-सा, बताओ तो सही।” “डकैती का धंपा।” उसने अपना सीना चौड़ा करके कहा। मानो कोई धार्मिक काम किया हो। मैं स्तब्ध था। “”डकैती” मैं हकला उठा।

हां, वह भी रेल डकैती डकैती की आजकल यही शैली चली हुई है। बड़ी धूम मची है समझो कि एक हवा है, एक फैशन है। मैंने भी सोचा कि जरा बहती गंगा में हाथ धो लूं। देखो, पहली ही बार हाथ धोने में कितना माल हाथ लग गया। अच्छी बोहनी हुई है।”

“”लेकिन यह सब हुआ कैसे?” मुझसे बिना पूछे रहा नहीं गया। “हुआ यों कि हम कुछ लोगों को यह ईश्वरीय संदेश मिला कि जब दादागिरी से नेतागिरी तक पहुंच ही गए हो तो आगे बढ़कर डकैतीगिरी भी करो और इस तरह नेतागिरी को पवित्रता तथा पूर्णता प्रदान करो।”

“फिर?” मेरी उत्सुकता बढ़ रही थी।

“फिर हम गए एक बड़े ही पहुंचे हुए मंत्री जी के पास बड़े पुण्यात्मा हैं!” मुख्यमंत्री के दाएं-बाएं दोनों हैं। पहले वे शुद्ध रूप से डकैती ही करते थे। जब से मंत्री बन गए हैं, बेचारे को देश की सेवा से फुर्सत नहीं मिलती है, इसीलिए अपने शिष्यों को डकैती के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं। हम सीधे जाकर उनके चरणों पर लोट गए। उन्होंने हमें उठाया गले लगाया और आशीर्वाद दिया। बड़े ही दिव्य पुरुष हैं। हमें पहले प्रशिक्षण दिया। बताया कि डकैती ही करनी है तो रेल डकैती में उतरो। उसमें हमें राज्य से लेकर केन्द्र तक संरक्षण मिलेगा। यहां से वहां तक डकैत ही भरे पड़े हैं। मंत्री जी बड़े दानी महात्मा भी हैं। उनके घर के आंगन में कट्टों का कारखाना लगा है। उन्होंने हमें कटूटे दिए। हमारे माथे पर टीका-बीका लगाकर हमें डकैती के लिए वीरोचित विदाई दी।

“डकैती आप लोगों ने डाली कैसे?” मैंने जानना चाहा। “बहुत आसान धंधा है यार एक स्लीपर कंपार्टमेंट में हम घुस गए। कुछ हवाई फायर किए। कुछ को मारा-पीटा। कुछ को डराया-धमकाया। खूबसूरत औरतों और लड़कियों को छेड़ा भी और लूटा भी। यानी टू इन वन उसके बाद तो समझो कि डरे हुए लोग हमारे सामने अपना सामान इस तरह भक्ति भाव से समर्पित कर रहे थे कि मानो प्रधानमंत्री राहत कोष में दान दे रहे हों।”

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“पुलिस ने आप लोगों को पकड़ा नहीं?” मैंने पूछा।

मेरे इस भोले-भाले प्रश्न पर वह ठहाके लगाने लगा। “पुलिस वहां थी ही कहां जो कुछ करती!” वह बोला ।

“तो पुलिस कहां थी?”

“यह जहां भी थी, सो रही थी। उसे तभी जगना था जबकि हम उसे जगाने जाते।”

“क्या मतलब?”

“मतलब यह कि लूट का सारा माल लेकर हम पुलिस के पास पहुंचे। उसे जगाया। उसे बताया कि हमने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया है, अब तुम अपना दायित्व पूरा करो उसने आरती उतारकर, घंटे-घड़ियाल के साथ पहले हमारा स्वागत किया। हम भाई-भाई की तरह गले मिले। अपनी इस एकता और अखंडता का निर्वाह करते हुए देश को मजबूत बनाने का वचन एक-दूसरे को दिया फिर उन्हें उनका हिस्सा दिया। उस हिस्से ने उनमें इतना देश-प्रेम का जोश भर दिया कि वे लुटी-पिटी जनता के प्रति अपना दायित्व निभाने के लिए दौड़ पड़े।”

“क्या तुम्हारी आत्मा इसके लिए तुम्हें चिक्कारती नहीं है?” मैंने एक बेकार सा सवाल पूछा। “देखो अमूमन हममें आत्मा नाम की चीज़ होती नहीं है और होती तो भी वह हमसे यही कहती कि हमें देश की खातिर एक विरासत का पालन करना ही चाहिए।”

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“कौन सी विरासत ?”

“इकती की विरासत। जब सारे डकैत देश के बड़े नेता बन बैठे तो ज़ाहिर है कि यह हम छोटे नेताओं का धर्म बनता है कि हम उनके धंधे को मरने न दें। उसे जीवित रखें।” “क्या तुम्हें कोई भय नहीं है कि तुम्हारी यह डकैती कभी पकड़ी जायगी?'”.

“नहीं, बिल्कुल नहीं!”

“क्यों?” “सँया भए कोतवाल।” वह बोला और हंसने लगा।

“क्या मतलब?” “मतलब नहीं समझोगे, जाओ मास्टरी करो।” उसने कहा और ज़ोरों के ठहाके लगाने लगा।

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