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Hindi story Hirasat me Hararat | हिरासत में हरारत

Hindi story Hirasat me Hararat एक व्यंगात्मक कहानी है‚ जो एक जाने माने व्यंग लेखक सी०भास्कर राव ( C. Bhaskar Rao ) द्वारा लिखित संग्रहों में से एक है। जिसे पढ़कर आपको बहुत ही आनन्द आयेगा। यदि यह व्यंगात्मक कहानी  आपको पसन्द आती है तो इस short story in hindi, hindi story for kids, moral stories in hindi, very short story, short story in hindi for kids को अपने Friends, Relatives आदि के साथ साझा करना बिल्कुल भी न भूलें।

Hirasat me Hararat

प्रायः हम देखते हैं कि हमारे राष्ट्रीय स्तर के नेता, किसी-न-किसी में फंसकर, उलझकर, हिरासत में जाने के बाद बीमार पड़ जाते हैं। बीमारी बढ़ाने उन्हें जमानत दिलवाने के लिए जोड़-तोड़ शुरू हो जाती है। ऐसे नेता जमानत मिलने तक हिरासत और अस्पताल के बीच सैर करते हैं। जो बीमारियां उनके सत्तासीन होते, उनसे कोसों दूर रहती हैं, जिनके बारे में कभी उन्होंने सुना तक नहीं होता है। ऐसी दुर्लभ बीमारियां भी उन्हें हिरासत में लिये जाते ही, दबोच लेती है।

लगभग उतनी ही ज़ोर से, जितनी कि वे हिरासत में आने के पूर्व, अपनी कुर्सियों को दबोचे रहते हैं। बेचारे ज़रा-सा सत्ता से बाहर हुए कि कमबख्त नाना किस्म की बीमारियां, उन्हें प्रेतों की तरह जकड़ लेती हैं। कुर्सी से हटते ही बीमारियां तक बेरहम हो जाती हैं। जैसे वे इसी प्रतीक्षा में बैठी रहती हैं कि वे कुर्सी से हिलें कि उन्हें हलाल कर दिया जाय। हालांकि अभी किसी बीमारी में इतनी ताकत नहीं आयी है कि वह किसी नेता को हलाल कर सके। इस देश की सबसे खतरनाक बीमारी नेतागिरी ही है।

हमारे नेता, बीमारियों की इस नीयत को समझते हैं, इसीलिए वे अंतिम दम तक अपनी कुर्सी छोड़ना नहीं चाहते हैं। जानते हैं कि इधर इनकी कुर्सी छूटी कि उधर उन पर बीमारियां टूटीं। लोग उनके इस दर्द को समझ नहीं पाते हैं। सोचते हैं कि कुर्सी का मोह उन्हें जकड़े रहता है, पर वास्तव में वे बेचारे बीमारियों से डरते हैं। इसी डर से वे हमेशा कुर्सी की शरण में बने रहना चाहते हैं। बीमारियों का भय ही उन्हें, कुर्सी शरण गच्छामि बनाता है। उन्हें किधर भी खींचों, जिधर भी दौड़ाओ, वे कुर्सी की ओर ही लपकते हैं।

बेतहाशा भागते हैं

जिन्हें कुर्सी से अलग करके हिरासत में ले लिया जाता है, उनकी हाय-हाय देखी नहीं जाती। उनकी दुर्गति देखकर कोई सोच भी नहीं सकता है कि वे इतने खुराफाती भी हो सकते हैं। हर प्रकार के पशु का अपना एक प्रिय खाद्य होता है। उसके सामने अन्य कुछ भी परोस दीजिए, वह सूंघकर छोड़ देगा। मुंह वहीं मारेगा, जहां मनपसंद भोजन दिखलाई पड़ेगा। नेताओं को अपनी कुर्सियों से अलग करना, उन पर अखाद्य को खाने के लिए दबाव डालना जैसा ही है।

जब तक वे कुर्सी पर रहते हैं, शेर की तरह दहाड़ते हैं। हिरासत में जाते ही हरारत के शिकार बन जाते हैं। बीमारियां भी कई प्रकार की होती हैं, उनमें हिरासत में हरारत एक प्रचलित बीमारी है। बीमारी के बहाने जब उन्हें जमानत मिल जाती है। वे छूट जाते हैं, फिर देखिए कि चंद घंटों में ही उनकी तथाकथित जानलेवा, गंभीर और घातक बीमारियां भी कैसे रफूचक्कर हो जाती हैं। एकदम । वे फिर से अपने साये में चले जाते हैं।

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दवा सेवन के पहले

और बाद का जो अंतर है, वही हिरासत के अंदर और बाहर नज़र आता है। देश की जनता यही उड़नछू। मानती है कि उनकी बीमारी एक विशुद्ध बहाना है। इसी बहाने वे हिरासत से अस्पताल में पहुंच जाते हैं। अस्पतालों से अपने घरों को और घरों से पुनः सत्ता के गलियारे में सूंघते हुए, चक्कर काटते हुए कि कहां कौन-सी कुर्सी खाली है। कुसी की टांग या टुकड़ा भी मिल जाय तो छोड़ते नहीं हैं, क्योंकि बीमारी के बाद, पुतः स्वास्थ्य और सत्ता लाभ का टॉनिक वही है। टॉनिक अंदर और नेता सिकंदर जनता की भावना अपनी जगह है।

मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ किसी राष्ट्रीय नेता को उच्ची बीमारियों और लुच्चे बहानों से जोड़ना ठीक नहीं है। उनका चरित्र बीमारियों से काफी ऊपर होता है। बीमारियां उनका क्या बिगाड़ लेंगी, कितना बिगाड़ लेंगी। जिसे आप बीमारी का बहाना मानते हैं, उसे मैं उनका राष्ट्र की चिंता में घुलना और गलना मानता हूं। बीमारियों के चलते वे दयनीय और दुबले नहीं होते है, बल्कि उनके पीछे हाय, इस देश का क्या होगा, यह चिंता उन्हें खायी जाती है। यह चिंता ही उनकी बीमारी होती है।

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इसका इलाज किसी नीम हकीम,

वैद्य या डॉक्टर के पास नहीं है। उन्हें जमानत पर छोड़कर देखिए वे कुर्सी के आस-पास पहुंचते ही कितने स्वस्थ और स्फूर्तिमान हो उठते हैं। उन्हें हमेशा देश कुर्सी के भीतर दिखता है। कुर्सी से हटते ही, चूंकि उनकी आंखों के सामने से देश ओझल हो जाता है, वे बीमार पड़ जाते हैं। उन्हें तरह-तरह की बीमारियां घेर लेती हैं। वे बुझ जाते हैं। मुरझा जाते हैं। लुट जाते हैं।

उनके हिरासत से छूटते ही रातोंरात चमत्कार हो जाता है। वे पुनः चमकदार हो जाते हैं। खुल-खिल उठते हैं। क्योंकि उनके सामने कुर्सी होती है। कुर्सी के भीतर देश होता है। जब भी वे हिरासत में और हरारत में होते हैं, हम उन्हें हिकारत से देखते हैं, जबकि ज़रूरत इस बात की है कि हम उनके मर्म को समझें। एक राष्ट्रीय नेता हिरासत में इसलिए बीमार पड़े कि उन्हें यह चिंता सताए जा रही थी कि यदि वे अंदर रहेंगे तो बाहर मानवता का विकास कैसे होगा क्योंकि अपराधियों को आश्रय देना भी, मानवता की रक्षा करना ही है।

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आखिर अपराधी भी मनुष्य ही है

एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के काम नहीं आएगा तो मानवता आगे कैसे बढ़ेगी। उन्हें महज इस आरोप में अंदर कर दिया गया था कि उन्होंने कभी अपराधियों को आश्रय दिया था, लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि उन्होंने अपराधी को अपराधी नहीं, बल्कि मनुष्य समझा। एक नेता इतना उदार होता है कि वह इन दोनों में कोई भेदभाव नहीं मानता है। ऐसे महान नेताओं को • जेलों में मच्छरों के हवाले कर देना, मानवता का गला घोंटना है। अब जेल से बाहर होकर भी वे इतने सदमे में हैं कि मानवता के विकास में योगदान देने से भी संकोच कर रहे हैं।

एक अन्य नेता हिरासत में इसलिए अस्वस्थ हुए कि यदि वे भीतर रहेंगे तो बाहर देश की एकता और अखंडता कैसे बचेगी। उन पर आरोप था कि उन्होंने किन्हीं दंगों के दौरान, एक समुदाय के खिलाफ दूसरे समुदाय को भड़काया था। दरअसल वे वहां दंगे भड़काने नहीं, बुझाने गए थे। दंगों से नेता का क्या रिश्ता इस देश में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है कि किसी दंगे के पीछे किसी नेता का हाथ हो। हमारे नेताओं का चरित्र, दंगों आदि से काफी ऊपर उठा हुआ होता है।

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लोग आपस में लड़-भिड़ लेते हैं

और तोहमत नेताओं पर लगा देते हैं। किसी नेता चलेगा कि कौन को आंखों से ठीक से दिखता तक नहीं हो और उसे रात में भी काला चश्मा खलनायकों की तरह चढ़ाए रखना पड़ता हो, उसे पता ही किस समुदाय का है। ऐसे लोगों पर यदि मुकदमे चलने लगें तो आप ही सोचिए कि इस देश में भाईचारे का क्या भविष्य होगा।

एक नेता इसलिए अस्वस्थ हुए कि उन्हें संवाद का संकट नज़र आया । व्यक्ति और व्यक्ति के बीच यदि कोई संवाद ही नहीं हो पाएगा तो संबंध क्या खाक बनेगा। संवाद संचार द्वारा होता है और संचारों में सबसे महत्त्वपूर्ण दूर संचार होता है। दूर संचार द्वारा दूर से भी संबंध बनने की संभावनाएं प्रशस्त होती हैं। संबंधों पर लोकतंत्र टिकता है और लोकतंत्र में देश दरअसल उनकी चिंता राष्ट्रव्यापी थी। उन्हें लगा कि वे भीतर रहेंगे तो जाहिर है कि बाहर संचार-व्यवस्था ठप्प हो जायगी।

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इसी व्यवस्था को दुरुस्त करने

के लिए वे विदेश गए थे। उनकी स्वस्थता पर देश की संचार व्यवस्था निर्भर कर रही थी। विदेश में उनका इलाज कराना आवश्यक था। उनके पीछे संचार जारी रहे, इसके लिए अपने घर में करोड़ों रुपये छिपाकर रखना भी ज़रूरी था। किसी ने उनकी इस मानवीयता और देश-प्रेम की भावना की ओर ध्यान नहीं दिया। यह देश का दुर्भाग्य है कि उधर वे स्वस्थ हुए और इधर संचार उनके हाथ से खिसक गया।

एक और नेता जानते थे कि यदि उन्होंने सत्ता छोड़ी तो वे भी बीमार पड़ेंगे और पूरा प्रदेश रोगग्रस्त हो जायगा। उन्होंने प्रदेश को रोगमुक्त रखने का बीड़ा उठाया। खुद बीमार पड़ने का जोखिम उठाया और सत्ता अपनी सहधर्मिणी को सौंप दी। एक नारी से बढ़कर पति और प्रदेश की बेहतर सेवा और कौन कर सकता है। उनके त्याग को समझने की आवश्यकता है। प्रदेश को बचाने के लिए कौन पति इतना त्याग कर सकता ।

यह अपने आप में एक आदर्श है। पति, पत्नी और प्रदेश संभालने के लिए ईश्वर ने इस धरती पर भेजा था, उन्हें सात सालों में ही सत्ता से बाहर कर दिया जाय तो बीमार पड़ना ही था। दरअसल ऐसे तमाम नेताओं को भीतर अपना अहित नज़र आता है और बाहर देश का हित उनका बीमार पड़ना तो फिर भी बर्दाश्त किया जा सकता है, पर उनकी अनुपस्थिति में देश बीमार पड़ने लगे, तो हमारे पास कोई उपाय नहीं रह जाता है सिवाय इसके कि उन्हें बाहर कर दिया जाय इस देश की बीमारियों का इलाज हमारे और आपके पास नहीं, सिर्फ उन्हीं के पास है।

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